‘पंच ही परमेश्वर’ की धारणा को साकार करते हुए यह व्यवस्था की गई, ताकि पुलिस और अदालतों पर, मुकदमों का अनावश्यक बोझ नहीं पड़े।
2006 में ही कानून बन गया कि अब गांवों के छोटे-मोटे फौजदारी व सिविल मामले ग्राम कचहरी में ही सुने जाएंगे।लेकिन 14 साल बाद भी हाल यह है कि पुलिस मामलों को ग्राम कचहरी को ट्रांसफर करने से बहुत हिचकती है।आईपीसी के तहत 36 धाराओं व सिविल मामलों में 10 दस हजार से कम मूल्य से जुड़े मामले ग्राम कचहरी के
लेकिन, मुख्यमंत्री, हाईकोेर्ट और डीजीपी के बार-बार के आदेश के बावजूूद पुलिस पंच परमेश्वर को उनका अधिकार देने में बहुत टसल करती है।अगर इस श्रेणी के मामले पुलिस के पास जाते भी हैं तो केस ग्राम कचहरी को ट्रांसफर करना पुलिस के लिए कानूनी तौर पर बाध्यकरी है।
इन अवरोधों के अलावा ग्राम कचहरी में जरूरी सुविधाओं का भी नितांत अभाव है। नोटिस का तामिला कराने के लिए चौकीदार तक नहीं हैं। न्याय मित्र और न्याय सचिव का आधा से अधिक पद खाली है। इसके लिए थाने-पुलिस के चक्कर नहीं लगाने होंगे। ताकि लोगों को मामूली खर्च में त्वरित न्याय मिल सके।

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